जांच की आवश्यकता और कारण विवरण

बेघरों के द्वारा दिन-प्रतिदिन के कार्यों में निम्न कठिनाईयों का सामना किया जाता है।

  • बसेरा
  • खाना हेल्थ (स्वास्थ्य)
  • रोजगार
  • पहचान
  • पिटाई और गालियों
  • नशे की लत यौन शोषण आदि

पिछले दशक में मुंबई की बदलती दशा और दिशा “शंघाईजेशन पिछले एक दशक में मुम्बई के सौंदर्यीकरण (शंघाईजेशन) पर विशेष जोर दिया गया। जिसकी वजह से शहर की दशा और दिशा में काफी परिवर्तन देखा गया। इसके तहत ही झुग्गियों को खत्म करने और उनके पुनर्वास का काम हुआ। इसी दौरान बहुत सारे व्यवसायिक केन्द्रों ने भी उपनगरों की तरफ अपना रुख कर लिया है जिसकी वजह से शहर के रोजगार के अवसर उत्तर की तरफ स्थानान्तरित हो रहे हैं। इन बदलावों के कारण शहर में घरविहीनता पर भी प्रभाव पड़ा है।

  “आतंकवाद” – पिछले कुछ सालों में आतंकवाद ने बेघरों के ऊपर सबसे गहरा असर डाला है। सुरक्षा जांच और कठोर पहचान के सबुतों, जोकि अधिकतर बेघरों के पास नहीं है की आवश्यकता बढ़ने की वजह से उनके पास पहले से ही सीमित रोजगार के अवसरों में और ज्यादा कमी आ गई हैं।

सुनियोजित स्टडी (जांच) का अभाव – बेघरों की उपेक्षा और उनकी समस्यों की उग्रता और भयावहता के बावजूद और बेघरों की गतिशील प्रकृति के कारण उन पर आज तक कोई सुनियोजित स्टडी नहीं हो पायी और न ही उनकी समस्याओं से संबंधित कोई कानूनी दस्तावेज तैयार हो पाया है। मुम्बई शहर में बेघरों की समस्याओं के बारे में अभी तक जो भी जानकारी या समझ हासिल हुई है वह अधिकतर उनकी समस्याओं के लिये कार्य करने वाले लोगों के अनुभव के आधार पर ही हुयी हैं। 2004 में बेघरों के ऊपर स्टडी करने का प्रयास Action Aid द्वारा, जिसमें BUILD भी शामिल थ, किया गया था। उन्होंने मिलकर बेघरों की गिनती का कार्य किया था। उन्होंने उसके बीच से एक सैम्पल समूह से उनकी सामाजिक-आर्थिक जानकारियाँ इकट्ठी की थी लेकिन वह स्टडी नो तो कभी पूरी की गई और ना ही कभी कहीं सार्वजनिक की गयी। इस प्रकार उनके लिये नया हस्तक्षेप या पैरवी करने के लिये वास्तव में कहीं कोई सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिये सबूतों पर आधारित जानकारी और हस्तक्षेप के लिये बेघरों के एक सैम्पल समूह पर सुनियोजित स्टडी प्रासांगिक थी।