
जाति इस सवाल का जवाब आशा के अनुरुप था। 84 उत्तरदाताओं ने इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया। उनमें 60 लोग बेघर परिवारों से थे और 24 व्यक्तिगत बेघरों से थे। इतनी सारी अनकों जातियों का अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और दूसरी पिछडी जातियों (OBC) के वर्गों में प्रमाणिक वर्गीकरण करना बहुत कठिन था। बहुत सारे उत्तरदाताओं ने वास्तविक जाति बताने के सिवाय सिर्फ अनुसूचित वर्ग (SC या ST) का ही नाम सामने रखा। बेघर परिवारों में अधिकतर विमुक्त समुदाय (Denotified Communities) और खानाबदोश जनजातियों के हैं। वाघरी और पारधी परिवारों की संख्या जनजातियों और स्टडी वाले क्षेत्रों के बेघर परिवारों में सबसे ज्यादा है। यें प्रवासी जनजातियाँ हैं लेकिन वे अब काफी स्थाई तरीके से एक ही जगह पर काफी लम्बे समय से रह रहे है इसका विश्लेषण अगले सैक्शन में विस्तार से किया गया है।
Table 33
बेघर परिवारों में 97% उत्तरदाता SC, ST और OBC से संबंध रखते हैं। व्यक्तिगत बेघरों में 83% SC, ST और OBC से संबंध रखते हैं। बेघरों परिवारो में 37% अनुसूचित जाति (SC) और व्यक्तिगत बेघरों में 33% अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखते हैं। अधिकतर बेघर परिवार 57% विमुक्त जनजातियों (Denotified tribes) से हैं। जबकि इनकी संख्या व्यक्तिगत बेघरों में 30% है। यह अंतर इसलिये है क्योंकि
1) खानाबदोश जनजातियाँ अधिकतर परिवार के साथ ही चलते है।
2) सामान्य वर्ग के परिवार गरीबी के बावजूद बेघर होने के कलंक से बचने के लिये शहर में प्रवास नहीं करते 3) एक सम्भावना यह भी है कि सामान्य वर्ग के परिवारों के पास खुद की जगह (जमीन) होने की सम्भावना रहती है जिसके कारण वे प्रवास करने से बचते हैं। [तमाम बेघरों की संख्या में 82% SC, ST या OBC से ताल्लुक रखते हैं] ज्यादातर बेघर SC, ST और OBC से होने के कारण सरकार की और ज्यादा जिम्मेदारी बनती है कि बेघरों की जाति और अति दरिद्रता के कारण शहर में दोहरी उपेक्षा के शिकार इन लोगों के लिये कोई अलग से स्कीम बनाये।
धर्म
धर्म के आधार पर बेघरों में सबसे ज्यादा हिंदू है। उसके बाद बौद्ध और मुस्लिम धर्म के लोग है।
Table 34
मूल राज्य
बेघरों के मूल स्थान का दायरा मुम्बई से लेकर आसाम और दिल्ली तक जाता है। बेघर परिवारों और व्यक्तिगत बेघरों में एक स्पष्ट रुझान दिखाई देता है। ज्यादातर बेघर परिवार मुम्बई या आस-पास के राज्यों से हैं। लगभग 39% बेघर परिवार गुजरात से हैं उसके बाद महाराष्ट्र से हैं।
जहाँ तब सिंगल व्यक्तिगत बेघरों का संबंध है उनमें 30% उत्तरप्रदेश से हैं,
महाराष्ट्र से 28% और गुजरात से 17%।
घरविहीनता का ब्यौरा
सड़कों पर रहने का अंतराल
पूरा सैंपल में 92% बैधर शहर की सड़कों पर पाँच साल से ज्यादा समय से रह रहे है। 96% बेघर परिवार और 87% व्यक्तिगत बेघर पाँच साल से ज्यादा समय से सड़कों पर रह रहे हैं 58% बेघर परिवार 20 साल से ज्यादा समय से सड़कों पर रह रहे है 26% व्यक्तिगत बेघर 20 साल से ज्यादा समय से सड़कों पर रह रहे है इसलिये बेघरों के मूल राज्यों के बारे में समझने के लिये यह अर्थ लगाना सही नहीं है कि उत्तरदाता इन क्षेत्रों से आये पहली पीढ़ी के लोग है। जैसा कि उपरोक्त पैरा से मालूम होता है कि ज्यादातर बेघर परिवारों को हम बाहर से आयें प्रवासी नहीं कह सकते। बल्कि वें 5 साल से ज्यादा से शहर में रह रहे यहाँ के बाशिन्दे हैं। इंटरव्यू के दौरान ये बात भी सामने आयी कि ज्यादातर बेघर परिवार अब दूसरी पीढी के बेघर है जिनके माता-पिता करीब 40 साल पहले आये थे। यद्यपि यह डाटा अलग से नहीं लिया गया था लेकिन 58% बेघर परिवार 20 साल से ज्यादा से रह रहे है और उनमें से 95% शादी शुदा हैं जिसके कारण दूसरी पीढी को भी अस्तित्व में आने का अच्छा मौका हैं। इसलिये ये बात साफ हो जाती है कि ज्यादातर बेघर परिवार दूसरी पीढ़ी के प्रवासी है। क्योंकि 67% व्यक्तिगत बेघर सिंगल (अकेले) इसलिये उन्हें पहली पीढी के प्रवासी ही कहा जायेगा। मूल जन्म स्थान से सम्पर्क कुल बेघरों में से 48% (यानि 300 में से 148) ने अपने मूल स्थान के साथ सम्पर्क बनाके रखा हुआ है जहाँ से वें खुद या उनके माता-पिता ने प्रवास किया था। 9% ने कोई संपर्क नहीं रखा हुआ है 26% शहर में ही पैदा हुए और 17% ने कोई जवाब नहीं दिया। सम्पर्क बनाये रखने वालों में से 53% ने बताया कि वे साल में 1 बार अपने मूल स्थान पर जाते है और 36% ने बताया कि वें त्यौहारों पर जाते हैं। ज्यादातर उत्तरदाताओं में से जिन्होंने साल में एक बार मूल स्थान जाने की बात कही थी वें मानसून के वक्त जाते है जब मुम्बई बारिश के कारण रहने लायक नहीं रह जाती है। इसलिये यह बात तो झूठी साबित हो जाती है कि बेघर समयानुकूल (सीजनल) प्रवासी हैं वो शहर में स्थाई नहीं हैं। उनका अपने मूल स्थान से सम्पर्क रखना शहर के अन्य निवासियों की तरह ही हैं। साथ ही साथ शहर में उनका स्थान का स्थायित्व भी हैं। फिर भी मानसून के दौरान गतिविधि की सुविधा भी कुछ लोगों को ही उपलब्ध हैं। मानसून के दौरान एक तो काम नहीं मिलता है दूसरे उनके रहने की जगहें बारिश के कारण रहने के लायक नहीं रह जाती है। इसलिये यह उन लोगों के लिये उपयोगी भी है कि वें यहाँ कार्य खत्म करके अपने-अपने गाँव चले जाते हैं और बारिश के बाद फिर लौट आते है|
मूल स्थान पर सम्पति
सैम्पल में 61% गाँव में कोई जमीन या घर नहीं रखते हैं। 37% ने बताया कि उनके गाँव में जमीन या घर है। इस प्रकार गरीब और गाँव में कोई भी जमीन या घर न रखने वाले लोगों की, शहर में प्रवास करने पर बेघर होकर रहने की ज्यादा सम्भावना है। राष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार की ग्रामीण श्रमिक जांच रिपोर्ट (Rural Labour Enquiry Report) के अनुसार गाँव के 55% SC 67%, ST और 57% OBC घरों के पास कोई जमीन नहीं। गुजरात और महाराष्ट्र में राष्ट्रीय आंकड़ों के मुकाबले अनुसूचित जाति (SC) के लोगों के पास अधिक प्रतिशत (Percentage) लोगों के पास जमीने नहीं है। गुजरात में 68% और महाराष्ट्र में 63% SC लोगों के पास जमीने नहीं हैं और यही वो दो राज्य हैं जिनसे सबसे ज्यादा बेघर परिवार और व्यक्ति संबंध रखते हैं।
अनुसूचित जनजाति (ST) के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज्यादा प्रतिशत 67% ST घरों के पास जमीने है लेकिन स्टडी के अनुसार बेघर परिवारों में सबसे बड़ा वर्ग ST का ही है। इसका कारण यह है कि उनमें से खाना बदोश और विमुक्त (Denotified) जनजातियों ने जिन्होंने शहर में प्रवास किया वें बेघर होकर रह गये इन खानाबदोशों के पास कभी कहीं जमीनें नहीं थीं और बेघरों में इनके सिवा दूसरी जनजातियों की संख्या नगन्य है। ज्यादातर जगहों पर स्टडी में बेघर परिवारों में खानाबदोश और विमुक्त समुदाय के लोग पाये गये इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि खानाबदोश जनजाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों के बिना जमीनों वाले लोगों की शहर में बेघर होकर रहने की सबसे ज्यादा संभावना हैं।