निष्कर्ष

  • वहन करने योग्य विकल्पों के अभाव में बेघर सड़क पर रहने को मजबूर है। किसी भी सरकारी स्कीम या योजना में उनका संज्ञान नहीं लिया गया है।
  • भारत में कोई भी NGO उनके लिये ईमानदारी से विस्तृत सोच से काम नहीं करता है। वर्तमान नीतियाँ और कानून बेघरों को अवैध और अपराधी ठहराते हैं। करीब 90% बेघर SC, ST और OBC से संबंध रखते हैं
  • ज्यादातर बेघर शहर की सड़कों पर 20 साल से भी ज्यादा समय से रह रहे हैं। ज्यादातर बेघरों ने वर्तमान लोकेशन इसलिये रहने के लिये चुनी क्योंकि वहाँ उन्हें बेहतर आर्थिक सम्भावनायें दिखाई दी।
  • BMC और पुलिस बेघरों के लिये सबसे बड़ी समस्यायें हैं। 77% बेघर मानसून में भी उसी लोकेशन पर रहते हैं। बेघरों में भोजन की सुरक्षा, विशेषकर आर्थिक संकट के समय बहुत अधिक है। बेघरों के लिये पीने के पानी और स्वास्थ्य व साफ सफाई की मूल भूत सेवायें पर्याप्त नहीं हैं और इनकी उन्हें बहुत अधिक कीमत चुकानी पड़ती है।
  • व्यक्तित्व बेघरों को हॉस्पिटल और स्वास्थ्य का लाभ उठाने में बहुत अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है विशेषकर अगर उन्हें हॉस्पिटल में भता होने की जरुरत पड़ जाती है तो।
  • बेघरों के करीब 51% बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं।
  • अधिकतर बेघरों के पास कोई पहचान प्रमाण पत्र नहीं हैं।
  • अधिकतर बेघरों के पास जब काम होता है तो उनकी आय 100 रुपये प्रतिदिन होती है।
  • करीब 86% बेघर कोई बचत नहीं कर पाते हैं।
  • करीब 70% बेघरों ने किसी ना किसी तरह का दुर्व्यवहार झेला है।
  • महिलाओं और परिवारों के मुकाबले अधिकतर पुरुष और व्यक्तिगत बेघर मानसिक आघात झेलते हैं।
बेघर जिस भी वर्ग से संबंध रखते हो जैसे कि बेघर परिवार, व्यक्तिगत बेघर, लोकेशन और लिंग उनकी कठिनाइयों का स्तर और प्रबलता निश्चित करने में महत्वपूर्ण योगदान रखते हैं। बेघर दूसरे लोगों की तरह अपनी हर गतिविधि के लिये तर्कसंगत और विवेक पूर्ण निर्णय लेते हैं, बशर्ते कि उनके पास विकल्प उपलब्ध हों। बेघर भी दूसरे लोगों की तरह इस शहर में बेहतर मौकों की तलाश में आये हैं। लेकिन विकल्पों की कमी कारण वें सड़कों पर रहने को मजबूर हैं और उनके पास एक ही विकल्प है कि वें रहने की जगह का खर्च वहन करने योग्य नहीं है, इस प्रकार वास्तविक विकल्प की बजाय यह एक थोपा गया विकल्प है। उनमें 78% ने कभी जगह बदलने की नहीं सोची क्योंकि उनके पास बहुत मुश्किल से ही कोई विकल्प होता है।

यह झूठ है कि देवघर अस्थाई रीजनल प्रवासी होते है। उनमें अधिकतर अब शहर के स्थाई निवासी है और उनमें से 93% को शहर में रहते हुये 5 साल से ज्यादा हो चुके हैं। मूल निवास से संबंधों के बारे में बेघरों का भी दूसरे निवासियों जैसा ही व्यवहार है। सामान्य अवधारणा के विपरीत 7 बेघर मानसून में भी गाँव जाने के बजाय अपने स्थानों पर ही बने रहते है। दूसरे 23% सीजनल प्रवासियों की तरह का व्यवहार दर्शाते है यानि कि मानसून के दौरान या तो गाँव चले जाते हैं या दूसरे शहरों में चले जाते हैं। हालांकि मानसून के दौरान बाहर चले जाना भी उनका मजदूरी का विकल्प है क्योंकि उस दौरान उनके लिये यहाँ काम उपलब्ध नहीं होता है और रड़के व फुटपाथ बारिश के कारण रहने लायक नहीं रह जाते हैं।

बेघर होकर रहने को मजबूर प्रवासी वें लोग होते हैं जो गरीब होते हैं और जिनके पास गाँव में भी कोई जमीन या घर नहीं होता है। किसी भी बिना जमीन या घर वाले गरीब का शहर में प्रवास करने पर उसकी शहर में भी देर रहने की सम्भावना ज्यादा होती है।

30 साल से ज्यादा उम्र के व्यक्तिगत बेघरों की संख्या में अचानक गिरावट आने के कारणों की भी जांच की जरुरत हैं। इससे व्यक्तिगत बेघरों के साथ कार्य करने और उनकी समस्याओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी हासिल हो सकती है। शादी के कारण थोडी संख्या में प्रवास के होते हुये भी इसे एक विश्वसनीय संकेत मिलता है कि अधिकतर शादियाँ लोकेशन पर ही देघर परिवारों के बीच हो रही हैं या फिर अकेले व्यक्तिगत बेघरों में आपस में जोड़े बन रहे हैं। बेघरों में परिवारों के बनने और उनके चलने के ऊपर अलग से स्टडी करना एक अच्छी एक्सरसाइज हो सकती है।

मूल भूत सेवाओं की उपलब्धता और उन तक पहुँच

बांद्रा से लेकर बोरीवली तक सभी क्षेत्रों में बेघरों की पहुँच सार्वजनिक शौचालयों और पीने के पानी तक नहीं हैं। सिविल सोसाइटी से ये अपेक्षा की जाती है कि वह स्थानीय सरकार पर बेघरों को शौचालयों और पीने के पानी की इन क्षेत्रों के पास व्यवस्था करे। बोरीवली. कांदिवली और मालाड के क्षेत्रों में नजदीक में कोई सार्वजनिक शौचालय नहीं हैं जबकि दक्षिण मुम्बई के सभी उत्तरदाताओं ने कहा कि वें नजदीकी सार्वजनिक शौचालयों का प्रयोग करते हैं। उपनगरों के मुकाबले मुम्बई नगर में बेघरों के लिये बेहतर सुविधायें उपलब्ध हैं। बेघरों को खाद्य सुरक्षा का सामना दोनों स्थितियों में करना पड़ता है जब उनके पास काम होता है तब भी और जब काम नहीं होता है तब और ज्यादा। जब वें कमाते हैं तो होटल उन्हें खाद्य सुरक्षा प्रदान करते हैं। धार्मिक स्थल बेघरों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। आर्थिक परेशानियों के समय बेघर धार्मिक स्थलों पर आश्रित रहते हैं। आर्थिक कठिनाईयों के समय दोस्त और परिवार बेघरों के लिये महत्वपूर्ण सहायक सिद्ध होते हैं और उनकी भोजन की मदद करते हैं।

खाद्य सुरक्षा और अनियमित काम के बावजूद अत्याधिक संख्या में बेघर भिखारी नहीं हैं। सिर्फ 6% खाने के लिये भीख मांगते हैं और 4.3% पूर्णरुप से भीख पर आश्रित हैं।

दक्षिण मुम्बई, उपनगरों के मुकाबले बेघरों के लिये ज्यादा असुरक्षित है क्योंकि BMC और पुलिस वहाँ उनकी जगहों से बेदखली की कार्यवाही ज्यादा करती है। Beggary Act का प्रयोग भी शहर में ज्यादा होता है।

बेघरों में इतनी समानता और आत्मविश्वास की कमी है कि वै काई महत्वकांक्षा भी नहीं रखते हैं और अपने दर्भाग्य को स्वीकार कर लेते हैं। उन्होंने दरिद्रता को स्वीकार कर लिया है जैसा कि उनके जवाबो में भी दिखाई देता है कि वें एक अदद घर की भी अभिलाषा नहीं रखते हैं व लम्बे समय से सड़कों पर रहने और उस समाज में धूल मिल जाने के कारण उनका गरीबी वाला ही नजरिया बन गया है। हमें उनमें आत्मविश्वास पैदा करने और समर्थ बनाने के लिये एक प्रक्रिया शुरु करनी पड़ेगी। बिना घर के उनके लिये इस दुष्चक्र को तोड़ना मुश्किल होगा।

अन्य निष्कर्ष

सुरक्षा के मुद्दों से लेकर कमाई तक महिलाओं के लिये ज्यादा परेशानी होती है। सब रोगों में पुरुषों के 46% के मुकाबले महिलाओं 77% ने ज्यादा दुर्व्यवहार झेला है। महिलाओं की औसत आय 121 रुपये भी पुरुषों की औसत आय 140 रुपये प्रतिदिन से कम हैं।

BMC और पुलिस बेघरों से और मानव जीवन से दो बहुत ही महत्वपूर्ण चीजें छीन लेती हैं। जीविका और बसेरा (भले ही वह खुले आसमान के नीचे हो)। बेदखली और गिरफ्तारी से वें उनके जीवन में उथल-पुथल मचा देते हैं और उन्हें उन्हीं चीजों से वंचित कर देते हैं जिनके लिये वो शहर में आये थे रक्षक ही भक्षक बन जाते हैं। बेघरों के लिये सरकार एक वेलफेयर स्टेट ना होकर टैरर स्टेट बनी हुयी है।