बेघर कौन हैं ?

शहरी बेघर शहरी समाज का वह अतिदरिद्र इंसान है जो इंसानों की सिर्फ दो मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा कर पाता है, यानि रोटी और कपड़ा लेकिन कोई मकान नहीं।  आधी रात के बाद इन लोगों का शहर में फुटपाथों पर, डिवाईडरों पर, हाथ गाडियों पर, धार्मिक स्थलों की सीढियों पर, बंद दुकानों के बाहर, ओवर ब्रिजों के नीचे, रेलवे प्लेटफार्मों पर, समुद्र के किनारे चौपाटी आदि स्थानों पर सोते हुये पाया जाता है। लोगों के दिमाग में इन लोगों की छवि, ड्रग्स का इस्तेमाल करने वाले, जेबकतरे, चोर और मलिन गुण्डों की बनती है। जबकि यह पूर्णतया सच नहीं है। इनकी इस छवि के कारण ही यें लोग कुछ आर्थिक लेन-देन अलावा मुख्य समाज से बहिष्कृत हो गये हैं। नौकरी ढूँढना, स्नान करना आदि छोटी-छोटी चीजों को हम लोग अहमियत नहीं देते है लेकिन बेघर लोगों के लिये ये बड़ी समस्यायें हैं। एक बेघर आदमी नौकरी ढूँढने या मांगने कैसे जाता होगा? वो कॉन्टेक्ट के लिये क्या पता और फोन नम्बर देते होंगे ? ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिन्हें हम अपने जीवन में महत्व नहीं देते, लेकिन एक बेघर के लिये वही बहुत बड़ी समस्या और चिन्ता का विषय होती है।

बेरोजगार बेघर आदमी को सुस्त और आलसी का दर्जा दे दिया जाता है। उनमें ऐसे बहुत से लोग हैं जो काम करना चाहते हैं लेकिन उन्हें बहुत अधिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। जब उनकी बाह्याकृति अस्त वयस्त दिखाई देती है कपड़े जीर्ण-शीर्ण होते हैं और वें किसी रेस्टोरेन्ट में भोजन की चाह में जाते हैं तो अक्सर उन्हें भगा दिया जाता है। कुछ बेघर मानसिक रोगों से ग्रसित हैं लेकिन तंत्र की कार्यप्रणाली के चलते उन्हें सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँचने के लिये नाकों चने चबाने पड़ते हैं। लोग उन्हें पागल और डरावने कहने लगते हैं जबकि उसी मानसिक बीमारी वाले धनाढ्य कलाकार या फिल्मी स्टार को लोग सिर्फ सनकी कहकर भूल जाते है। नशे की लत भी कभी-कभी समस्या बन जाती है लेकिन अमीर और गरीब किसी को भी इस तरह की लत लग सकती है। यह बेघरों का समूह सामान्यतया अपनी मलिन बाह्याकृति के कारण स्वास्थ्य, सेवा और सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं तक पहुँचने में बहुत कठिनाईयों का सामना करता है। मुख्यतया ये लोग कानून का पालन कराने वाली एजेंन्सियों के लिये भी आसान और कमजोर निशाना होते हैं। उनके संवैधानिक, कानूनी और मानवाधिकारों पर लगातार बेकाबू हमले होने से उनका अस्तित्व ही हमेशा खतरे में बना रहता है। हमारे संविधान का आर्टिकल 21 अपने नागरिकों को आत्मसम्मान से जीने का अधिकार देता है लेकिन जिन हालातों में बेघर लोग रहने को मजबूर होते हैं उनमें बिना सम्मान के सब अधिकारों का हनन होना अनिवार्य हैं। सुरक्षित और उपयुक्त घर के अलावा भी बेघर लोगों को अनेकों समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अक्सर उन्हें बहुत सी सामाजिक प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। प्राईवेट और सरकारी सेवाओं और जीवन की अति आवश्यक जरुरतों तक भी उनकी पहुँच कम होती है।

1. हेल्थ केयर सेवाओं तक पहुँच में कमी

2. शिक्षा तक सीमित पहुँच

3. हिंसा और दुरुपयोग के बढ़ते खतरे

4. दूसरे लोगों द्वारा तिरस्कार और भेदभाव किया जाना

5. मुख्यधारा से सामान्य संबंधों में कमी

6. रोजगार के लिये उपयुक्त ना समझा जाना

7. बैंकिंग सेवाओं तक पहुँच में कमी बेघर लोगों के साथ अछूतों के जैसा व्यवहार किया जाता है इस तरह का देशनिकाले जैसा व्यवहार बेघर लोगो में निराशा की भावना के साथ आत्मसम्मान में कमी और अयोग्यता की भावना को बढ़ावा दे सकता है।