बेघरों को संरक्षण प्रदान करने वाली स्कीमे और नीतिया

1. भारत सरकार के श्रम मंत्रालय के पास जीविका प्रशिक्षण के क्षेत्र में अनेकों योजना की व्यवस्था है। उनसे संबद्ध इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टिटयूट्स (ITI) देश के हर राज्य में विद्यमान है यह संस्था अनेकों तकनीकी क्षेत्रों जैसे कि वेल्डिंग, टेलरिंग, बुक बाइंडिंग और ड्राईविंग आदि में प्रशिक्षण प्रदान करती है लेकिन सिर्फ उन लोगों को जो आठवीं पास कर चुके हैं। जबकि वास्तविक परिस्थिति यह है कि बहुत सारे युवकों के पास, चाहे वें परिवार के साथ बड़े हुये हों या बिना परिवार के, इन प्रोगामों में हिस्सा लेने के लिये पर्याप्त शैक्षणिक योग्यता नहीं है।

2. दि महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (MNREGA) : मनरेगा का उद्देश्य गाँवों में गरीबी दूर करना और विस्थापन को रोकना है। इस स्कीम में गाँव के गरीबों को निम्न वेतन पर साल में 100 दिनों के रोजगार की गारंटी की जाती है। जबकि शहरों में इसके समतुल्य ऐसी कोई रोजगार की स्कीम नहीं है।

3. दिन स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना (STSRY) : इसमें स्वरोजगार प्रोग्राम और चेतना रोजगार प्रोग्राम प्रदान किया गया है स्वरोजगार स्कीम के तहक एक सीमित धन राशि और बिजनेस प्लान का होना अनिवार्य है जो कि किसी बेघर के पास होना नामुमकिन है। वेतन प्रोग्राम सिर्फ 5 लाख की आबादी से कम वाले शहरों में ही क्रियाशील है जिससे मुम्बई जैसे बड़े शहर, जहाँ बेघरों की समस्या सबसे ज्यादा है, इस प्रोग्राम से बाहर हो जाते हैं।

आवास

पिछले पचास सालों में सरकार की पोलिसी खंडित स्कीम आधारित एप्रोच (पद्धति) से परिपक्व होकर आवास को अब एकीकृत विकास के हिस्से के रुप में देखने लगी है। द नेशनल हाऊसिंग पॉलिसी और द नेशनल हाऊसिंग बैंक इस नयी सोच के ही परिणाम है। फिर भी हम आगे देखेंगे कि इनमें से किसी भी स्कीम में बेघरों की आवश्यकताओं को शामिल नहीं किया गया है।

दि राजीव आवास योजना (RAY) : यह योजना “झुग्गी-झोंपड़ी मुक्त भारत” के सपने के साथ शहरी गरीबों के आवास और शहरों में जमीन की कमी की समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित करने के लिये राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को बहु-आयामी पद्वति अपनाने के लिये प्रेरित करती है। RAY 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत (2009/ 2010-2016 /2017) तक लागू रहेगी। इसका उद्देश्य 16 उन लोगों सुव्यवस्थित सिस्टम में लाने और उन अर्बन डेवलपमेंट और अर्बन प्लानिंग की, जो समानता और समावेश की परिस्थितियों पैदा करने में विफल रहीं, कमियों को दूर करना है।

दि नेशनल कॉमन मिनिमम प्रोग्राम (2004) ने भारत के गरीबों की आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान केन्द्रित किया। एक लाख करोड़ का जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूअल मिशन (JNNURM) प्रोजेक्ट 2005 में लागू किया गया था जिसने अर्बन इन्फ्रास्ट्रक्चर के एकीकृत विकास और शहरी गरीबों को मूलभूत सेवाओं, आवास और पानी की सप्लाई सहित, पर विशेष जोर देते हुए अपना ध्यान केंद्रित किया था। जबकि वर्तमान की योजनाओं में भी बेघर वर्ग के सड़क पर गुजर-बसर करने वाले लोगों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। किसी भी पोलिसी डोक्यूमैंट और हाऊसिंग प्रोग्राम में ना तो उनका लेखा-जोखा रखा गया है और ना ही कोई मान्यता दी गयी है।

2007 में वर्ल्ड हैबिटेट डे (World Habitat Day) के अवसर पर यूनियन कैबिनेट ने “वाल्मीकि अंबेडकर आवास योजना” को अगले पंचवर्षीय योजना के लिये 2000 करोड़ रुपये का अनुदान दिया था। NDA सरकार के शहरी विकास के यूनियन मिनिस्टर ने घोषणा की थी कि शहरी गरीबों के लिये राजकीय क्षेत्र (Public Sector) की संस्था हर साल 5 लाख दहन योग्य (affordable) घर बनाएगा रियल एस्टेट डेवलपर्स के अनुमान के मुताबिक महानगरों (Metro Cities) के सुदूरवर्ती उपनगरों में एक रुम किचन की चाल (घर) कम से कम दो लाख रुपये की कीमत में पड़ेगी। 15 साल के लोग की मासिक किश्त 1860/- रुपये होगी जोकि झुग्गी-झोपड़ी में रहने
लिये, अपनी तुलनात्म आबादी के आकार और महत्व के कारण दिल्ली एक अच्छा मानदण्ड है। दिल्ली के बसेरे स्थायी बसेरे हैं जो सामुदायिक केन्द्रों के भवनों या बेघरों के बसेरों के लिये समर्पित सुविधाओं में चलाये जाते हैं। उन्हें रैन बसेरे के नाम से जाना जाता है। सर्दियों में और अधिक मात्रा में तम्बुओं में अस्थाई बसेरे बनाये जाते हैं। इनमें से कुछ बसेरे सीधे दिल्ली सरकार द्वारा चलाये जाते है और कुछ NGOs के साथ मिलकर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) के आधार पर चलाये जाते हैं। दिल्ली में कुल 34 स्थायी बसेरे चलाये जा रहे हैं। दिल्ली सरकार ने Mission Convergence” के नाम से बेघरों की समस्याओं के हल निकालने के लिये एक अलग मेकेनिज्म खड़ा किया है। इसमें एक Mother NGO (NGO) और 5-6 NGOS मिलकर बेघरों के लिये कार्य करते है। इस संस्था द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधाओं में हेल्प और सामाजिक (Basic Social) सर्विसेज फॉर होमलैस, रैन बसेरे, Soup kitchens (जन आहार), स्टेट चिल्ड्रन के घर, भिखारियों का पुनर्वास Improvement of Asha Kiran and Services for mentally ill homeless, Police और Operational research support शामिल हैं। सन् 2010 में दिल्ली सरकार ने शहर के बेघरों का विस्तृत सर्वे कराया था और उन्हें अस्थाई पहचान पत्र दिये गये थे। इन पहचान पत्र में उनकी लोकेशन के साथ फोटो आई डी होती है।

4. बेघरों के लिये सुप्रीम कोर्ट के निर्देश : उपरोक्त पोलिसियों में लापरवाही और बेघरों की उपेक्षा की वजह से सन् 2010 की सर्दियों में दिल्ली सरकार ने कॉमनवेल्थ गेम्स की खातिर पूसा रोड के सौंदर्यीकरण के लिये बेघरों के लिये बनाये गये हीरो को तो जीता था जिसके फलस्वरूप कड़ाके के ठंड के कारण 2 लोगों की मौत हो गई थी। मीडिया और एक्टिविस्टो के द्वारा ये मुद्दे उछाले जाने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को इस मामले स्वतः संज्ञान लेगा पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जारी किया कि सभी राज्य सरकारों को 62 क्लारा वन शहरों में सभी मूलभूत सुविधाओं के साथ 24 घंटें चलने वाले सारे बनाने होंगे। प्रत्येक शहर को प्रति 1 लाख जनसंख्या पर एक बसेरा बनाना होगा। इस प्रकार 2011 के आंकड़ों के आधार पर मुम्बई की 12478447 की जनसंख्या पर कम से कम 124 बसेरे होने चाहिये थे लेकिन एक भी अस्तित्व में नहीं है। बसेरों में मूलभूत सुविधाये जैसे चारपाई. बिस्तरे, टॉयलेट, पीने योग्य पानी, लॉकर्स, फर्स्ट एड. नशा मुक्ति और मनोरंजन का इंतजाम होना चाहिये। यह हैं आदेश मई 2010 में जारी किया गया था और एक साल बाद भी महाराष्ट्र सरकार ने दृढता से अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटते हुये आदेश के अनुसार बसेरों का निर्माण नहीं कराया।

ऊपर दिये गये प्रोग्रामों की लिस्ट से ये साफ जाहिर है कि महाराष्ट्र सरकार और BMC (Mumbai Municipal Corporation) के रडार पर बेघर आबादी कि नहीं है। ज्यादातर स्कीमें झुग्गी-झोपड़ियों के निवासियों और दूसरे गरीब शहरी वर्गों से संबंधित हैं और बेघर लोगों की समस्याओं और परेशानियों का निवारण नहीं करती हैं |