
एक बेघर इसलिये बेघर है क्योंकि उसके सर पर छत नहीं है मुम्बई के चरित्र के बारे में कहा जाता है “यह आपको भोजन दे सकती है लेकिन रहने को छत नहीं यह सिर्फ कहावत नहीं है बल्कि बेघरों के लिये एक जीती-जागती हकीकत हैं। वास्तव में स्टडी से भी संकेत मिलता है कि बेघरों को बसेरा उपलब्ध कराना उनकी सबसे बड़ी मदद होगी। करीब-करीब सब उत्तरदाताओं ने कहा था कि उन्हें वहन करने योग्य घर या बसेरे उपलब्ध कराये जायें। इसलिये बेघरों की क्षमता के अनुसार उनके लिये घर बनाने की शीघ्र आवश्यकता है तभी उनके लिये वहन करने का विकल्प आता है। सभी मूल भूत स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस बसेरे बनाने से उनके रहने के खर्चे कम हो जायेंगे क्योंकि पानी खरीदने के लिये अत्याधिक कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी। बार-बार बेदखली से बचे रहने के कारण उनके जीवन में स्थायित्व आयेगा इससे उनके कार्यों में निरंतरता आयेगी और निवास प्रमाण पत्र बन जाने से उन्हें नियमित काम मिलने की सम्भावना बढ़ जाएगी। नियमित, स्थिरता और कम खर्च से उनकी खाद्य सुरक्षा बढ़ेगी और उन्हें सम्मानित जीवन जीने का मौका मिलेगा। इससे उनकी बचत बढ़ेगी और उन्हें सम्पत्ति बनाने का मौका भी मिलेगा। जैसा कि सरकार के प्रोग्रामों की समीक्षा में वर्तमान में देखे गये “Affordable Housing Schemes” बेघरों की क्षमता से बाहर की चीज है। भाड़े का घर या वसेरा बेघर परिवारों और महिलाओं की आवश्यकताओं, जैसा कि FGDS में भी अपनी चाह बेटों-ने बता रही थी और सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसा ही आदेश दिया था के अनुरूप डिजाइन किया जाना चाहिये। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन्स में विस्तार से मानदण्ड तय किये गये हैं, उनका बसेरे-बनाते वक्त पालन होना-आहिये। 80/78% उत्तरदाताओं ने BMC और ने पुलिस को अपने जीवन का सबसे बड़ा खतरा बताया। इससे दो बातों के संकेत मिलते हैं। पहला ये कि जैसा GDS में भी बताया गया कि प्रशासन उनके प्रति संवेदनहीन है और उन्हें अवैद्य समझता है, दूसरा ये कि बेघरों के लिये कोई प्रबंध. पोलिसी प्रोग्राम या गाइड लाईन्स नहीं हैं इसलिये यें अधिकारी उन्हें सार्वजनिक जगहों पर कब्जा करने वाले अवैद्य लोग मानते हैं और इस सबसे ऊपर उन्हें अपराधी बनाने वाला Beggary Prevention Act जैसा कानून, जो उन्हें सड़कों पर जीविका कमाने के लिये अपराधी ठहराता है।
सरकारी नीतियों में बेघरों को स्थान ना मिलना, उनका जिक्र तक न होना और BMC और पुलिस का बेघरों के प्रति रवैया दर्शाता है कि सरकार की सोच में उनका कोई महत्व नहीं है और ये सरकारी प्रोग्रामों की समीक्षा में भी सामने आ चुका है। बेघरों की आवश्यकताओं के आंकलन में सामने आयी मुख्य सिफारिशें इस प्रकार हैं बेघरों के लिये और उनको अवैद्य करार देने से रोकने के लिये पोलिसी बनाई जाये, बसेरे बनाने के लिये सुप्रीम कोर्ट की गाईड लाईन्स पर अमल किया जाये, Beggary Act में बदलाव किया जाये और बेघरों के बारे में फैली अफवाहों को दूर करने के लिये जागरुकता पैदा की जाये। यह आसानी ने निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सब बेघर खाद्य असुरक्षा के शिक हैं क्योंकि उनके पास नियमित काम नहीं होता है और आपातस्थिति के लिये ना ही कोई बचत होती है। जैसा कि FGDS में सामने आया था कि जब भी काम मिलता है तो वो नियमित नहीं होता है जिससे आर्थिक परेशानियाँ पैदा होती हैं।
आर्थिक परेशानियों के वक्त खाने के लिये पैसा उधार लेते हैं । 2% बैधर धार्मिक स्थानों में भोजन प्राप्त करते हैं और 66 भीख मांग लेते हैं। कम आय होने के कारण खाने की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं होती है इस प्रकार बेघर आबादी अत्याधिक खाद्य असुरक्षा का सामना करती है और इसके लिये उपयुक्त हस्तक्षेप की आवश्यकता है। बेघर परिवारों की खाद्य सुरक्षा बढ़ाने के लिये यह महत्वपूर्ण है कि उन्हें राशन कार्ड दिये जायें ताकि वें सब्सिडी वाला राशन खरीद सकें साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाये कि उनके हक का राशन उन्हें मिले। केवल 40% बेघरों के पास ही राशन कार्ड है।
बोरीवली, कांदिवली बकोला और बांद्रा में पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध करायी जाये और विशेषकर ताड़देव में जहाँ आसपास कोई सुविधा ना होने के कारण लोगों को आसपास की सोसाईटी से पानी खरीदना पड़ता है। बोरीवली में पीने का पानी एक नाले के साथ वाली ट्टी पाईप लाईन से लिया जाता है। बोरीवली और कांदिवली में सार्वजनिक शौचालयों की जरुरत है क्योंकि वहाँ आस पास कोई नहीं है। पानी की अधिक कीमत से कारण स्नान करना बहुत ही कठिन है, उनकी आय का दसवां हिस्सा स्नान करने में ही चला जाता है। सार्वजनिक शौचालयों द्वारा उन्हें मासिक सदस्यता की तरह की सुविधा देकर उन्हें खास तौर पर महिलाओं को सस्ते में स्नान की सुविधा प्रदान की जा सकती है।
बेघरों के 40% बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। उनके बच्चों को स्कूल में दाखिला देने और पढ़ाई की सुविधा पर भी विशेष ध्यान दिये जाने की जरुरत है। 55% बेघरों के पास कोई पहचान पत्र नहीं हैं। 86% कोई बचत नहीं करते। केवल 26 लोगों के बैंक में खाते है। इस तरह बेघरों के लिये पहचान के दस्तावेज उपलब्ध कराये जाने की सख्त जरुरत है। राशन कार्ड, पहचान पत्र और बैंकिंग सिस्टम से जुड़ाव आदि कुछ ऐसे क्षेत्र है जहाँ उन्हें सीधे तौर पर सहायता सेवा की जरूरत है। उन्हें मुम्बई के पहचान प्रमाण पत्र और UID प्राप्त करने में मदद करना भी उनके लिये बहुत सहायक हो सकता है क्योंकि इसके बिना उन्हें अपराधी और अवैद्य ठहराकर उनके नागरिक अधिकार और सम्मान से जीने के अधिकार छीन लिये जाते हैं। 82% बेघर SC, ST और OBC से संबंध रखते हैं। ये उनके लिये विशेष स्कीम बनाने का अच्छा कारण बन सकता है क्योंकि उन पर दोहरी मार पड़ती है। पहला जाति के कारण परम्परागत अधिकार विहीनता और दूसरी शहर में भी अधिकार विहीन बनकर रहना।
शहर में बहुत से NGO सड़कों पर रहने वालों के साथ काम करते हैं लेकिन अधिकतर बच्चों और युवकों के लिये हैं, लेकिन कोई भी NGO बेघरों की समस्याओं के लिये ईमानदारी से काम करता। कुछ NGOS ने उन्हें राशन कार्ड दिलाने के लिये और बच्चों की शिक्षा दिलाने में मदद की है. इसके अलावा दक्षिण मुम्बई के एक NGO ने बेघर युवकों के लिये नियमित प्रोग्राम चला रखा है । इसके सिवा किसी भी दूसरी जगह पर विस्तृत तरीके से बेघरों के मुद्दों पर नियमित तरीके से काम करने वाला कोई संगठन नहीं है।
इस तरह सिविल सोसाइटी के लिये इस समूह, जिससे जीवन का सम्मान छीन कर उसे अधिकार विहीन और अस्मत बनाकर छोड़ दिया गया. के साथ हस्तक्षेप शुरु करने की तुरंत जरूरत है। उनके लिये मूलभूत सुविधाओं सहित बसेरे बनाने और वहन योग्य घर बनाने के साथ उनकी उनके अधिकारों और सम्मान के लिये लड़ने में मदद करने की भी तुरंत नितांत आवश्यकता है |